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जीन एडिटिंग और CRISPR जैसी तकनीकों ने जन्म से पहले जेनेटिक बीमारियों को रोकने की उम्मीद जगाई है. हालांकि, बच्चे की हाईट, आंखों का रंग या बुद्धिमत्ता तय करना अभी वैज्ञानिक रूप से संभव नहीं है. फिर भी इस तकनीक को लेकर दुनियाभर में बहस और रिसर्च लगातार जारी है.
जीन एडिटिंग (Gene Editing) की तेजी से बढ़ती दुनिया.
क्या ऐसा समय आ सकता है जब माता-पिता अपने बच्चे के जन्म से पहले ही उसकी कुछ खास खूबियां चुन सकें? जैसे कि वह लंबा हो, उसकी आंखों का रंग खास हो या फिर उसे जेनेटिक बीमारियों का खतरा न हो. यह सवाल आज विज्ञान की दुनिया में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है. इसकी वजह है जीन एडिटिंग (Gene Editing) और CRISPR जैसी आधुनिक तकनीकें, जो इंसानी डीएनए में बदलाव करने की क्षमता रखती हैं. हालांकि, इसका यूज जेनेटिक बीमीरियों की रोकथाम के लिए किया जाना है, लेकिन जब इतना हो सकती है तो साइंस की दुनिया में आगे डिजाइनर बच्चे भी पैदा हो सकते हैं. यह सवाल काफी चर्चा में है.
चलिए थोड़ा डिटेल में जानते हैं, हमारे शरीर का पूरा खाका डीएनए में छिपा होता है. इसी डीएनए में मौजूद जीन (Genes) यह तय करते हैं कि शरीर कैसे विकसित होगा. आंखों का रंग, बालों की बनावट और कई बीमारियों का जोखिम भी जीन से जुड़ा होता है. Healthline की रिपोर्ट के अनुसार, जीन एडिटिंग ऐसी तकनीक है जो वैज्ञानिकों को डीएनए के कुछ हिस्सों में बदलाव करने की अनुमति देती है. फिलहाल इसका मुख्य उद्देश्य उन जेनेटिक गड़बड़ियों को ठीक करना है, जो सिकल सेल एनीमिया या सिस्टिक फाइब्रोसिस जैसी बीमारियों का कारण बनती हैं. हालांकि, जब बात बच्चे की लंबाई, आंखों के रंग या अन्य शारीरिक गुणों को चुनने की आती है, तो मामला काफी जटिल हो जाता है.
पिछले कुछ वर्षों में CRISPR तकनीक ने इस क्षेत्र में नई उम्मीद जगाई है. वैज्ञानिक इसे डीएनए की “एडिटिंग टूल” के रूप में देखते हैं. इसकी मदद से उन जीनों की पहचान की जा सकती है जो कुछ गंभीर जेनेटिक बीमारियों के लिए जिम्मेदार होते हैं. हालांकि, जीन एडिटिंग के जरिए बच्चे को ज्यादा बुद्धिमान, लंबा या खास रंग की आंखों वाला बनाया जा सकता है. लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार यह इतना आसान नहीं है. इंसान की बुद्धिमत्ता, लंबाई और व्यक्तित्व सिर्फ एक या दो जीन पर निर्भर नहीं करते. इनके पीछे सैकड़ों जीन और वातावरण, पोषण, शिक्षा तथा जीवनशैली जैसे कई कारक काम करते हैं.
यही कारण है कि आज की तारीख में विज्ञान यह दावा नहीं करता कि किसी बच्चे को “आइंस्टीन” जैसा दिमाग या तय हाईट देकर पैदा किया जा सकता है. हालांकि, जेनेटिक बीमारियों के जोखिम को कम करने के लिए जीन एडिटिंग भविष्य में एक महत्वपूर्ण हथियार बन सकती है.
इस तकनीक को लेकर कई चिंताएं भी सामने आती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भविष्य में लोग मनचाहे गुण चुनने लगें, तो इससे सामाजिक असमानताएं बढ़ सकती हैं. इसलिए दुनिया के कई देशों में जीन एडिटिंग पर सख्त नियम लागू हैं.
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विविधा सिंह इस समय News18 हिंदी के डिजिटल मीडिया में सब एडिटर के तौर पर काम कर रही हैं. वह लाइफस्टाइल बीट में हेल्थ, फूड, ट्रैवल, फैशन और टिप्स एंड ट्रिक्स जैसी स्टोरीज कवर करती हैं. कंटेंट लिखने और उसे आसान व …और पढ़ें