16 जून बलिदान दिवस पर विशेष: इतिहास के पन्नों में कुछ ऐसे नायक होते हैं जिनका बलिदान इतना महान होता है कि सदियाँ बीतने के बाद भी उनकी वीरता की गूँज कम नहीं होती। अविभाजित भारत के ऐसे ही एक महान हिंदू योद्धा थे—सिंधु सम्राट राजा दाहिर। आइए, इतिहास की परतों को खोलते हुए जानते हैं कि कैसे एक उदार राजा ने अपनी मातृभूमि की अस्मिता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।
नायक का परिचय और स्वर्ण काल
राजा दाहिर का जन्म सन् 663 में हुआ था और वे 679 ईस्वी (कुछ इतिहासकारों के अनुसार 695-712 ईस्वी) में सिंध के सिंहासन पर बैठे। उनका साम्राज्य आज के पाकिस्तान के सिंध प्रांत से लेकर बलूच और पंजाब की सीमाओं तक फैला हुआ था।
राजा दाहिर का शासनकाल धार्मिक सहिष्णुता, उदारता और शांति का प्रतीक था। उनके राज्य में हिंदू मंदिर, पारसियों के अग्नि मंदिर, बौद्ध स्तूप और अरब से आए मुसलमानों की मस्जिदें सब एक साथ मौजूद थीं। उन्होंने अरब व्यापारियों को समुद्र के किनारे बसने और व्यापार करने की पूरी आज़ादी दी थी, लेकिन इसी उदारता के बदले उन्हें मिला—धोखा!
सिंध पर अरबों की गिद्ध दृष्टि
खलीफाओं ने जब ईरान और अफगानिस्तान पर कब्ज़ा कर वहां की जनता को बलपूर्वक इस्लाम अपनाने पर मजबूर कर दिया, तो उनकी भूखी नज़रें भारत के समृद्ध सिंध प्रांत पर टिकीं। सिंध की धरती को हथियाने के लिए अरब के शासकों ने एक के बाद एक कई प्रयास किए।
इतिहास का कड़वा सच: ईस्वी सन् 638 से 711 ई. तक के 74 वर्षों में, 9 अलग-अलग खलीफाओं ने भारत के इस प्रवेश द्वार (सिंध) पर 15 बार आक्रमण किया। पहले 14 आक्रमणों को सिंध के वीरों ने नाकाम कर दिया, लेकिन 15वां आक्रमण सबसे घातक साबित हुआ।
मोहम्मद बिन कासिम का क्रूर अभियान
इराक के प्रांतपति अल हज्जाज ने अपने 17 वर्षीय क्रूर भतीजे और दामाद मुहम्मद बिन कासिम को 10 हजार सैनिकों, घोड़ों और ऊंटों की विशाल फौज के साथ सिंध पर हमला करने भेजा।
कासिम के इस अभियान ने सिंध की धरती को खून से लाल कर दिया। प्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ 'चचनामा' के अनुसार, कासिम ने अपने चाचा हज्जाज को पत्र में लिखा था—”सिवस्तान और सीसाम के किले जीत लिए गए हैं। गैर-मुसलमानों का वध कर दिया गया है या उनका जबरन धर्मांतरण कराया गया है। मंदिरों को तोड़कर वहां मस्जिदें खड़ी कर दी गई हैं।” देवल, सेहवान और मुल्तान को जीतकर कासिम ने वहां अपनी सत्ता स्थापित की।
अपनों की गद्दारी और राजा का वीरगति पाना
राजा दाहिर इस भयानक संकट के समय अकेले ही लड़ते रहे। भारत के अन्य राजाओं से उन्हें कोई सहयोग नहीं मिला। इसके बावजूद उन्होंने सिंधी शूरवीरों और युवाओं का आह्वान किया और एक देशभक्त सेना तैयार की।
युद्ध के मैदान में सिंधु वीरों ने ऐसा पराक्रम दिखाया कि अरबी सेना हार की कगार पर पहुँच गई। सूर्यास्त के समय जब युद्धविराम हुआ, तो थक चुके सिंधु वीर अपने शिविरों में विश्राम करने चले गए। लेकिन तभी इतिहास की सबसे बड़ी गद्दारी हुई। ज्ञानबुद्ध और मोक्षवासव नामक दो देशद्रोहियों ने रात के अंधेरे में कासिम की सेना का साथ दिया और सोते हुए सिंधु वीरों पर पीछे से हमला बोल दिया। धोखे से हुए इस कायरतापूर्ण हमले में महाराज दाहिर लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
सिंधी वीरांगनाओं का ऐतिहासिक जौहर
महाराज की शहादत के बाद जब अरबी सेना राजधानी अलोर की तरफ बढ़ी, तो सिंध की वीरांगनाओं ने घुटने टेकने के बजाय तलवारें उठा लीं। रानी लाडी के नेतृत्व में महिलाओं ने तीरों और भालों से अरबियों का स्वागत किया।
जब संख्या बल में कम होने के कारण वीरांगनाएं टिक नहीं पाईं, तो उन्होंने दुश्मनों के हाथ लगने के बजाय अपने सतीत्व और सम्मान की रक्षा के लिए 'जौहर' (अग्नि कुंड में कूदना) को चुना। सिंध के दीवान गुन्दुमल की बेटी ने अपना सिर कटवाना स्वीकार किया, लेकिन मीर कासिम की दासी या पत्नी बनना स्वीकार नहीं किया।
इतिहास के साक्ष्य
राजा दाहिर और उनके परिवार का यह सर्वोच्च बलिदान केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि यह उस दौर के क्रूर आक्रमणों और भारत के स्वाभिमान की वो हकीकत है, जो आज भी चचनामा, मुमताज पठान की 'तारीख़-ए-सिंध' और जीएम सैय्यद की 'सिंध के सूरमा' जैसी ऐतिहासिक किताबों में दर्ज है।
राजा दाहिर इतिहास के वो अमर नायक हैं जिन्होंने यह साबित किया कि पद और सत्ता बदल सकती है, लेकिन मातृभूमि के प्रति निष्ठा कभी नहीं बदलती।