आखिर क्यों साउथ के हर बड़े स्टार को खींच लाता है ‘मूकम्बिका मंदिर’, कहते हैं माता खुद बुलाती हैं?
इस मंदिर का गर्भगृह बेहद जादुई है. वहां एक पवित्र ज्योतिर्लिंग है, जिसके बिल्कुल बीच से एक चमकीली सोने की रेखा गुजरती है. ये रेखा लिंग को दो हिस्सों में बांटती है. एक हिस्सा शिव का है और दूसरा शक्ति का. यानी यहां साक्षात शिव और पार्वती एक साथ बसते हैं. बाद में विजयनगर के राजाओं से लेकर मैसूर के वाडेयार राजवंश तक, सबने इस जगह को संवारा और आज यह लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है.
जूनियर NTR और ऋषभ शेट्टी तो अक्सर इस मंदिर में आते हैं.
2. यहां दौलत नहीं, ‘हुनर’ का वरदान मिलता है
आमतौर पर लोग मंदिरों में पैसा, बिजनेस या नौकरी की दुआ मांगते हैं, लेकिन मूकम्बिका मंदिर की कहानी थोड़ी अलग है. यह मंदिर कला, संगीत, बुद्धि और ज्ञान का पावर-हाउस माना जाता है. यहां मां को साक्षात सरस्वती का रूप माना जाता है.
यही वजह है कि दक्षिण भारत में जब कोई बच्चा पहली बार लिखना-पढ़ना शुरू करता है, तो माता-पिता उसे यहां लेकर आते हैं. इस रस्म को ‘अक्षर अभ्यास’ कहते हैं. कलाकारों के बीच तो ये अटूट विश्वास है कि अगर अपनी कला में महारत हासिल करनी है, तो मां मूकम्बिका की चौखट पर हाजिरी लगानी ही होगी. चाहे कोई नया गाना कंपोज करना हो, किसी बड़ी फिल्म की शुरुआत करनी हो या जिंदगी का कोई बड़ा फैसला लेना हो, सितारे यहां आशीर्वाद लेने पहुंच ही जाते हैं.
3. इस मंदिर से जुड़े दो मशहूर किस्से ऐसे हैं, जो सदियों तक सुनाए जाएंगे.
पहली कहानी है संगीत के बेताज बादशाह इलैयाराजा की. उनका मां मूकम्बिका से ऐसा नाता है कि वे अक्सर चुपचाप यहां आकर बैठ जाते हैं. मां के प्रति उनके इसी प्यार का नतीजा था कि पिछले साल 2025 में उन्होंने देवी मां के लिए कई करोड़ रुपये का, हीरों से जड़ा एक बेहद खूबसूरत मुकुट बनवाया और उन्हें समर्पित कर दिया.
दूसरी कहानी है मशहूर सिंगर के.जे. येसुदास की. साल 2000 से उनका एक नियम है. हर साल जनवरी में अपने जन्मदिन पर वे यहां आते हैं और मां के सामने बैठकर शास्त्रीय संगीत गाते हैं, जिसे ‘संगीताशना’ कहा जाता है. उनके लिए यह कोई कॉन्सर्ट नहीं बल्कि मां की इबादत है. आज उनकी इस भक्ति ने एक बड़े 9 दिनों के म्यूजिकल फेस्टिवल का रूप ले लिया है, जहां देश भर के संगीतकार जुटते हैं.
4. ‘ऐसा लगता है जैसे अपनी मां के घर लौट आए हों…’
वैसे तो यह मंदिर कर्नाटक में है, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि यहां सबसे ज्यादा भक्त पड़ोसी राज्य केरल से आते हैं. मंदिर के साइनबोर्ड कन्नड़ के साथ-साथ मलयालम में भी लिखे हैं और यहां का स्टाफ भी बड़े प्यार से मलयालम बोल लेता है.
केरल के जाने-माने पॉलिटिकल एनालिस्ट श्रीजीत पणिक्कर इस जुड़ाव को बेहद भावुक शब्दों में बयां करते हैं. वे कहते हैं,
“कोल्लूर आना ऐसा लगता है जैसे कोई इंसान सालों बाद अपने मायके आया हो. वही पुराना प्यार, वही सुकून और वही एहसास. वहां से पैर निकलते ही दिल वापस जाने के लिए तड़पने लगता है.”
लोग कहते हैं कि मूकम्बिका देवी के दरबार की एक अनोखी रीत है. आप कितनी भी प्लानिंग कर लें, कितना भी पैसा खर्च कर लें, आप अपनी मर्जी से इस मंदिर की सीढ़ियां नहीं चढ़ सकते. आप वहां तभी पहुंच पाते हैं, जब खुद मां मूकम्बिका का बुलावा आता है.
रिपोर्ट: सौम्या कलसा और चंद्रकांत विश्वनाथ, न्यूज़18