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Daydreaming Addiction : क्या आपका दिमाग भी दिनभर ख्यालों की दुनिया में खोया रहता है? अगर यह आदत दिन के कई घंटे छीन रही है, तो यह ‘मैलएडैप्टिव डे-ड्रीमिंग(what is maladaptive daydreaming)’ नामक मानसिक बीमारी हो सकती है. जानें इसके पीछे की असल वजह और इससे छुटकारा पाने के 4 आसान उपाय.
How To Overcome Daydreaming Addiction : क्या आपके साथ कभी ऐसा होता है कि आप ऑफिस में काम कर रहे हों या पढ़ाई करने बैठे हों, और अचानक आपका दिमाग कहीं दूर उड़ जाए? आप खुद को किसी फिल्मी दुनिया के हीरो की तरह देखने लगें या अपने पसंदीदा टीवी शो के मुख्य किरदार बन जाएं, जहां आपकी असल जिंदगी से कुछ अलग और मजेदार चल रहा हो! दिन में ही ख्यालों में खोए रहना यानी डे-ड्रीमिंग (Daydreaming) एक बेहद आम बात है, जिससे हर कोई कभी न कभी गुजरता है.
रिसर्च के मुताबिक, जब हम जागे होते हैं, तब हमारे दिमाग की कुल एक्टिविटी का लगभग 30 से 50 परसेंट हिस्सा उन बातों में खोया रहता है, जिनका हमारे मौजूदा काम या हालात से कोई लेना-देना नहीं होता. लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही मासूम सी दिखने वाली आदत कब एक गंभीर लत बन जाती है और आपकी असल जिंदगी को बर्बाद करने लगती है? आइए इसे बिल्कुल आसान शब्दों में समझते हैं.
आमतौर पर थोड़ी-बहुत कल्पना करना हमारे दिमाग को फ्रेश करता है और नई सोच देता है. मगर दुनिया में लगभग 2 से 4 परसेंट लोग ऐसे हैं जिनके लिए यह एक गंभीर मानसिक समस्या बन जाती है, जिसे मेडिकल साइंस में ‘मैलएडैप्टिव डे-ड्रीमिंग’ (Maladaptive Daydreaming) कहा जाता है. इस कंडीशन में लोग बहुत लंबे समय तक सिर्फ अपनी कल्पनाओं में ही डूबे रहते हैं.
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इस समस्या से जूझ रहे कई लोग तो दिन के 12-12 घंटे सिर्फ ख्यालों में ही बिता देते हैं, जिससे उनकी रोजमर्रा की नॉर्मल जिंदगी पूरी तरह रुक जाती है. ख्यालों की दुनिया में खोए रहने की यह चाहत इतनी तगड़ी होती है कि लोग इसकी तुलना चॉकलेट खाने की क्रेविंग या सोशल मीडिया स्क्रॉल करने की लत से करते हैं. यह आदत व्यक्ति को असल दुनिया की जिम्मेदारियों से बहुत दूर ले जाती है, जिससे तनाव और डिप्रेशन बढ़ने लगता है.
इसका एक बड़ा उदाहरण यूएस में रह रही कमला(बदला हुआ नाम) हैं, जिनके करियर पर इस आदत का बहुत बुरा असर पड़ा. वह बताती हैं कि इस लत के कारण उनके अंदर आगे बढ़ने का कोई मोटिवेशन ही नहीं बचा था, जिसके चलते वह 40 की उम्र में भी शुरुआती स्तर (एंट्री-लेवल) का ही काम कर रही थीं. उन्होंने ख्यालों की दुनिया में बिजी रहने के कारण रियल लाइफ में कभी प्रमोशन पाने की कोशिश ही नहीं की.
बीबीसी की एक रिपोट के मुताबिक, इंटरनेशनल सोसायटी फॉर मैलएडैप्टिव डे-ड्रीमिंग की रिसर्च डायरेक्टर और क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट वांडा फिशर कहती हैं कि जब हमारी असल जिंदगी थोड़ी बोरिंग या कम रोमांचक होती है, तो लोग कल्पनाओं की दुनिया को छोड़ नहीं पाते. एक्सपर्ट्स का मानना है कि दिन में बहुत ज्यादा सपने देखने की यह आदत अक्सर उन लोगों में देखी जाती है जो खुद को दूसरों से कुछ कम काबिल या कमतर समझते हैं.
इतना ही नहीं, कई स्टडीज से यह भी पता चला है कि इस तरह लगातार ख्यालों में खोए रहने का कनेक्शन बचपन के किसी बुरे हादसे या ट्रॉमा (Trauma) से हो सकता है. ऐसे लोग असल में अपने जीवन के पुराने दुखों और दर्दनाक यादों से बचने के लिए ख्यालों की इस नकली दुनिया को अपना सहारा बना लेते हैं. कई दूसरी रिसर्च में इसका सीधा संबंध एडीएचडी (ADHD), ओसीडी (OCD), डिप्रेशन और भारी तनाव से पाया गया है.
अगर आपको भी लगता है कि दिन में सपने देखने की यह लत आपकी जिंदगी का कीमती समय बर्बाद कर रही है, तो सबसे पहले अलर्ट (सचेत) रहना शुरू करें. इसके अलावा, आप उन ट्रिगर पॉइंट्स पर ध्यान दें जिनकी वजह से आप अचानक ख्यालों में डूब जाते हैं; जैसे- अकेले वक्त बिताना या कोई ऐसा इमोशनल गाना सुनना जो आपको पुरानी यादों में ले जाए, और ऐसी चीजों से दूरी बनाएं.
इस लत को पूरी तरह खत्म करने के लिए जब भी आप खुद को डे-ड्रीमिंग करते हुए पकड़ें, तो उसे तुरंत किसी डायरी में नोट (दर्ज) कर लें. इससे आपके दिमाग को वापस हकीकत में आने में मदद मिलेगी. आखिरी और सबसे जरूरी बात, अगर यह आदत आपके लाख चाहने पर भी कंट्रोल नहीं हो रही है और आपके काम को नुकसान पहुंचा रही है, तो बिना शर्माए किसी प्रोफेशनल डॉक्टर या थेरेपिस्ट से मिलकर थेरेपी लेने के बारे में जरूर सोचें.(All Image Credit : Canva)