significance of the month of Muharram: मोहर्रम इस्लामिक कैलेंडर यानी हिजरी संवत का पहला महीना होता है। इस्लाम धर्म में इस महीने का ऐतिहासिक, धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से बहुत बड़ा महत्व है। यह महीना केवल इस्लामी नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक नहीं है, बल्कि त्याग, धैर्य, सत्य और न्याय के लिए संघर्ष की प्रेरणा भी देता है। यह महीना खुशियां मनाने का नहीं, बल्कि इंसाफ, सच्चाई, सब्र/ धैर्य और महान शहादत को याद करने का समय है।
1. मोहर्रम मास का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व
2. मोहर्रम मास की मुख्य परंपराएं
3. एक आम गलतफहमी का निवारण: क्या मोहर्रम कोई त्योहार है?
आइए समझते हैं कि इस्लाम में इस महीने का क्या महत्व है और इसके दौरान कौन सी परंपराएं निभाई जाती हैं:
1. मोहर्रम मास का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व
* चार पवित्र महीनों में से एक (अशहुरुम हुरुम)
कुरान और इस्लाम की मान्यताओं के अनुसार, साल के 12 महीनों में से 4 महीने बेहद पवित्र और अदब के माने गए हैं, जिनमें से मोहर्रम एक है। अल्लाह के रसूल पैगंबर हजरत मोहम्मद (स.अ.व.) ने इसे 'अल्लाह का महीना' कहा है। इन चार पवित्र महीनों में किसी भी प्रकार की लड़ाई-झगड़े या युद्ध को पूरी तरह प्रतिबंधित (हराम) माना गया है।
* कर्बला की ऐतिहासिक शहादत
मोहर्रम महीने का महत्व इतिहास की एक ऐसी घटना से जुड़ा है जिसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। सन 61 हिजरी (680 ईस्वी) में इराक के 'कर्बला' नामक स्थान पर एक तरफ इस्लाम के सिद्धांतों को बचाने वाले पैगंबर मोहम्मद के नवासे (नाती) हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथी, जिनमें उनके परिवार के छोटे बच्चे और महिलाएं भी थीं, और दूसरी तरफ अत्याचारी शासक यजीद की बड़ी सेना थी।
यजीद चाहता था कि इमाम हुसैन उसके गलत तौर-तरीकों और क्रूर शासन को जायज ठहराते हुए उसके आगे झुक जाएं। लेकिन इमाम हुसैन ने हक यानी सच्चाई और इंसानियत की रक्षा के लिए झुकने से मना कर दिया। यजीद की सेना ने इमाम हुसैन और उनके परिवार का पानी तक बंद कर दिया और अंत में 10वें मोहर्रम (यौम-ए-आशुरा) के दिन इमाम हुसैन और उनके साथियों को बेहद बेरहमी से शहीद कर दिया गया।
इमाम हुसैन की यह शहादत दुनिया को यह सिखाती है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, अत्याचार के आगे कभी सिर नहीं झुकाना चाहिए और हमेशा सच्चाई का साथ देना चाहिए।
2. मोहर्रम मास की मुख्य परंपराएं
दुनिया भर के मुसलमान, विशेषकर शिया समुदाय और कई जगहों पर सुन्नी समुदाय भी इस महीने में इमाम हुसैन और उनके परिवार की कुर्बानियों को याद करते हुए कई परंपराएं निभाते हैं:
मजालिस (धार्मिक सभाएं): मोहर्रम के शुरुआती 10 दिनों में 'मजालिस' का आयोजन किया जाता है। इसमें धार्मिक गुरु (उलेमा) कर्बला के इतिहास, इमाम हुसैन के संदेशों और उनके परिवार पर ढाए गए जुल्मों की दास्तान सुनाते हैं, जिसे सुनकर लोग शोक व्यक्त करते हैं।
मातम और नोहा ख्वानी: शिया समुदाय के लोग काले कपड़े पहनकर इमाम हुसैन के गम में मातम करते हैं। इस दौरान 'नोहा' (शोक गीत) पढ़े जाते हैं, जिसमें कर्बला के शहीदों के दर्द को बयां किया जाता है।
ताजिया निकालना: भारत, पाकिस्तान और कई अन्य देशों में मोहर्रम की 10वीं तारीख (आशुरा) को बांस, लकड़ी और रंग-बिरंगे कागजों से इमाम हुसैन के रौजे (मकबरे) की प्रतिकृति बनाई जाती है, जिसे 'ताजिया' कहा जाता है। लोग अकीदत (श्रद्धा) के साथ जुलूस के रूप में इन ताज़ियों को निकालते हैं और अंत में इन्हें कर्बला या स्थानीय कब्रिस्तान या निश्चित स्थान पर सुपुर्द-ए-खाक यानी दफन कर देते हैं।
सबील और लंगर लगाना: इमाम हुसैन और उनके भूखे-प्यासे बच्चों की याद में मोहर्रम के दिनों में जगह-जगह 'सबील' अर्थात् ठंडे पानी, शरबत या दूध के स्टॉल लगाए जाते हैं, जहाँ से गुजरने वाले हर राहगीर को बिना किसी भेदभाव के पानी या शरबत पिलाया जाता है। साथ ही गरीबों के लिए मुफ्त भोजन/ लंगर का इंतजाम किया जाता है।
आशुरा के रोजे (उपवास): सुन्नी समुदाय में मोहर्रम की 9वीं और 10वीं तारीख (या 10वीं और 11वीं तारीख) को रोजा रखने की विशेष परंपरा है। पैगंबर मोहम्मद साहब इस दिन रोजा रखा करते थे और उन्होंने इसे रमजान के बाद सबसे उत्तम रोजा बताया है।
3. एक आम गलतफहमी का निवारण: क्या मोहर्रम कोई त्योहार है?
अक्सर गैर-मुस्लिम समाज में लोग इसे 'मोहर्रम का त्योहार' कह देते हैं, जो कि गलत है। मोहर्रम कोई त्योहार या उत्सव नहीं है, बल्कि यह इस्लाम का एक शोक (गम) का महीना है। यही कारण है कि इस महीने में कोई भी खुशी का काम (जैसे शादी-ब्याह, नया घर खरीदना या जश्न मनाना) नहीं किया जाता है।
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