नई दिल्ली: मौत के बाद क्या होता है. यह सवाल सदियों से इंसानों को परेशान करता रहा है. अब साइंटिस्ट्स ने इसका एक जवाब तो खोज ही लिया है. पोर्टलैंड के एक स्टार्टअप नेक्टोम ने सुअर के पूरे दिमाग को सुरक्षित रखने में बड़ी कामयाबी हासिल की है. इस रिसर्च ने मेडिकल साइंस की दुनिया में तहलका मचा दिया है. साइंटिस्ट्स का दावा है कि मौत के बाद भी दिमाग को सेल्युलर डैमेज से बचाया जा सकता है. इसके लिए मौत के समय को पहले से प्लान करना जरूरी है. ओरेगन जैसे राज्यों में मरीजों को अपने अंतिम समय को चुनने का अधिकार है. वहां का कानून मरीजों को यह छूट देता है. अब इसी कानून का सहारा लेकर इंसानों पर इस तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा. गंभीर रूप से बीमार मरीजों को यह सुविधा दी जाएगी.
इस पूरी प्रक्रिया का मकसद इंसान की यादों और चेतना को भविष्य के लिए सुरक्षित रखना है. ताकि आने वाले समय में उन्हें किसी तरह से फिर से जीवित किया जा सके.
सुअर के दिमाग को साइंटिस्ट्स ने कैसे सुरक्षित रखा?
रिसर्चर्स ने इस पूरी प्रक्रिया को बहुत ही बारीकी से डिजाइन किया है. उन्होंने सुअर को इसलिए चुना क्योंकि उसका दिमाग इंसानों से काफी मिलता-जुलता है. सुअर का कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम भी लगभग इंसानी शरीर की तरह काम करता है. हार्ट अटैक के करीब 10 मिनट बाद टीम ने दिल में एक ट्यूब डाली. इस ट्यूब के जरिए शरीर से सारा खून बाहर निकाल लिया गया.
खून निकालने के बाद शरीर की नसें पूरी तरह से खाली हो जाती हैं. इसके बाद दिमाग में एल्डिहाइड नाम का केमिकल डाला गया. यह केमिकल प्रोटीन के बीच एक ब्रिज बनाता है. इससे दिमाग के अंदर मौजूद हर चीज अपनी जगह पर लॉक हो जाती है. यह लॉक इतनी मजबूती से होता है कि सेल्स अपनी जगह से नहीं हिलते. इसके बाद टिश्यू के अंदर मौजूद पानी को क्रायोप्रोटेक्टेंट्स से बदल दिया गया.
यह एक खास तरह का फ्लूइड होता है. यह दिमाग को ठंडा होने पर बर्फ के क्रिस्टल बनने से रोकता है. अगर बर्फ के क्रिस्टल बन जाएं तो वे दिमाग के टिश्यू को फाड़ सकते हैं. इसलिए इस फ्लूइड का इस्तेमाल बहुत ही जरूरी हो जाता है. इसके बाद तापमान को -32 डिग्री सेल्सियस तक गिरा दिया गया. इस तापमान पर दिमाग के टिश्यू सदियों तक सुरक्षित रह सकते हैं. यह एक बहुत बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि मानी जा रही है.
इस रिसर्च में 14 मिनट का समय क्यों बहुत ज्यादा जरूरी है?
- इस पूरी प्रक्रिया में टाइमिंग का रोल सबसे ज्यादा अहम है. साइंटिस्ट्स के पास इस काम को अंजाम देने के लिए बहुत कम समय होता है. जब मौत के 18 मिनट बाद प्रक्रिया शुरू की गई तो नतीजे अच्छे नहीं थे. उस समय दिमाग के बाहरी हिस्से में सेल्युलर ब्रेकडाउन के साफ संकेत मिले.
- इसका मतलब है कि कोशिकाएं टूटने लगी थीं. इसके बाद टीम ने इस देरी को कम किया और इसे 14 मिनट से नीचे ले आए. इससे पूरा रिजल्ट ही बदल गया. माइक्रोस्कोप के नीचे देखने पर न्यूरॉन्स बिल्कुल सुरक्षित नजर आए. न्यूरॉन्स के बीच के जंक्शन भी पूरी तरह से ठीक थे.
- मौत के बाद कोशिकाओं के अंदर मौजूद एंजाइम आसपास के टिश्यू को पचाने लगते हैं. अगर ऐसा हो गया तो कोई भी केमिकल उन्हें वापस नहीं जोड़ सकता है. इसलिए 14 मिनट का गैप इस पूरे प्रोजेक्ट का सबसे अहम हिस्सा है.
कनेक्टोम तकनीक क्या है और यह इंसानी यादों को कैसे बचाएगी?
यह पूरा प्रोजेक्ट एक खास आइडिया पर टिका हुआ है. दिमाग की थ्री-डायमेंशनल वायरिंग को कनेक्टोम कहा जाता है. कई रिसर्चर्स मानते हैं कि इसी वायरिंग में इंसान की सारी जानकारी छुपी होती है. इसी से इंसान के विचार और यादें बनती हैं. अगर इस वायरिंग को सुरक्षित कर लिया जाए तो इंसान का दिमाग बच सकता है. सुअर के दिमाग पर हुए टेस्ट से पता चलता है कि वायरिंग को लॉक किया जा सकता है.
हालांकि इसे बाद में पढ़ना और डिकोड करना एक अलग चुनौती है. माउस के दिमाग के एक छोटे हिस्से की मैपिंग करने में ही सात साल लग गए थे. इंसानी दिमाग तो उससे लगभग 1000 गुना बड़ा है. जमे हुए दिमाग से किसी इंसान को वापस लाने का कोई तरीका अभी तक मौजूद नहीं है. फिर भी इस दिशा में यह एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है.
मौत के 14 मिनट बाद भी जिंदा रहता है दिमाग? नई रिसर्च ने चौंकाया. (Photo made with AI)
नेक्टोम स्टार्टअप अब गंभीर मरीजों को यह सुविधा कैसे देगा?
- कुछ ही महीनों में नेक्टोम स्टार्टअप गंभीर मरीजों को ओरेगन बुलाने का प्लान बना रहा है. वहां का कानून डॉक्टरों को मरीजों की मदद से मौत की इजाजत देता है. मरीज दवा लेने से पहले कुछ दिन अपने परिवार के साथ बिता सकेंगे. डॉक्टर जब मौत की पुष्टि कर देंगे उसके तुरंत बाद प्रिजर्वेशन शुरू हो जाएगा. यह तरीका जानबूझकर चुना गया है ताकि कोई गलती न हो.
- क्रायोनिक्स के ज्यादातर प्रयास प्राकृतिक मौत के बाद शुरू होते हैं. उस समय तक दिमाग बिना खून के 14 मिनट से ज्यादा रह चुका होता है. सुअर के डेटा ने 14 मिनट के कटऑफ को बहुत साफ कर दिया है. जो भी इंसान इस प्रक्रिया के लिए साइन अप करेगा उसे अपना शरीर दान करना होगा. इस दान के लिए मरीजों को पहले से लीगल पेपरवर्क पूरा करना होगा. इसके बाद उनके दिमाग को हमेशा के लिए एक खास स्टोरेज में रख दिया जाएगा.
- यह स्टोरेज बेहद ठंडे तापमान पर काम करता है. यह उम्मीद की जाएगी कि भविष्य की कोई एडवांस तकनीक उन्हें फिर से जीवित कर सके. दुनिया भर के साइंटिस्ट्स इस डाटाबेस का इस्तेमाल रिसर्च के लिए कर सकेंगे. यह मेडिकल साइंस के इतिहास का सबसे बड़ा प्रयोग होने वाला है.
इस अनोखी तकनीक का बायोलॉजिस्ट और आलोचक क्यों विरोध कर रहे हैं?
हर कोई इस रिसर्च से पूरी तरह सहमत नहीं है. बर्मिंघम यूनिवर्सिटी के बायोलॉजिस्ट जोआओ पेड्रो डी मैगलेहेस ने इसे सिर्फ एक केमिकल फिक्सेशन बताया है. जोआओ ने कहा, ‘यह प्रक्रिया दिमाग को बचाती है लेकिन उसे बायोलॉजिकल रूप से मृत ही छोड़ देती है’. उनका मानना है कि कोई भी मौजूदा तकनीक इसे वापस नहीं ला सकती है.
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या किसी इंसान की वायरिंग को फिर से बनाना उसे वापस लाना है. अगर एक परफेक्ट कॉपी बन भी जाए तो वह मूल इंसान से अलग होगी. यह प्रोजेक्ट जीवित करने के बजाय डुप्लीकेशन के ज्यादा करीब लगता है.
कुछ अन्य रिसर्चर्स भी मानते हैं कि स्ट्रक्चर को बचाना और फंक्शन को वापस लाना दो अलग बातें हैं. कनेक्टोम की मैपिंग से यह पता नहीं चलता है कि जिंदगी में व्यवहार कैसे पैदा हुआ. यह अनुवाद अभी भी मेडिकल साइंस के लिए एक बड़ा रहस्य है.
क्या इस रिसर्च से भविष्य में मौत की परिभाषा पूरी तरह बदल जाएगी?
- यह काम मौत की मानक मेडिकल परिभाषा के खिलाफ जाता है. कैलिफोर्निया के एक टिश्यू प्रिजर्वेशन रिसर्चर ब्रायन वोक ने कहा, ‘खून का प्रवाह रुकते ही किसी को मृत घोषित कर देना बायोलॉजिकल सच्चाई से ज्यादा एक व्यावहारिक फैसला है’.
- अगर इस विंडो के खुलने के कुछ मिनट बाद तक दिमाग का पूरा स्ट्रक्चर बच जाता है तो स्थिति बदल जाती है. ऐसे में मरने और मृत होने के बीच की रेखा खींचना बहुत मुश्किल हो जाता है. डॉक्टर जिन्हें आज के मानकों के हिसाब से मृत घोषित करते हैं उनके पास भी वह सब हो सकता है जो उन्हें एक इंसान बनाता है.
- हाल ही में सेल्युलर लेवल पर बिना डैमेज के फ्रोजन ब्रेन टिश्यू को पुनर्जीवित करने का काम भी हुआ है. सुअर के रिजल्ट्स इस बातचीत को और आगे ले जाते हैं. अस्पतालों और परिवारों को भविष्य में इन नई नैतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा.
प्रिजर्वेशन के बाद इंसानी दिमाग का भविष्य क्या होने वाला है?
यह दुनिया में पहली बार है जब किसी टीम ने एक पूरे मैमल्स के दिमाग के अंदर सेल्युलर डिटेल को फ्रीज किया है. क्लीनिकल डेथ के बाद भी उसे अपनी जगह पर बनाए रखा है. अगर कोई काफी तेजी से काम करता है तो दिल धड़कना बंद होने के तुरंत बाद वायरिंग खत्म नहीं होती है. अब आगे क्या होगा यह काफी हद तक वालंटियर्स पर निर्भर करता है.
- अगर गंभीर रूप से बीमार मरीज इस रास्ते को चुनते हैं तो नेक्टोम के पास इंसानी दिमाग इकट्ठा होने लगेंगे. यह भविष्य के रिसर्चर्स के काम करने के लिए बहुत ही ठोस सामग्री होगी. क्या इनमें से कोई भी दिमाग कभी किसी जीवित इंसान को पैदा कर पाएगा यह भविष्य के साइंटिस्ट्स के हाथों में है.
- सुअर पर हुआ काम इस बात का पूरा वादा नहीं करता है. यह रिसर्च सिर्फ यह दिखाती है कि ऐसा करने के दरवाजे अब बंद नहीं हैं. आने वाले समय में हो सकता है कि रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इस काम में मदद करें. हो सकता है कि इंसान का दिमाग किसी कंप्यूटर सिस्टम में भी अपलोड किया जा सके.